शब्द-शब्द सुमिरन सार, कहत करत उतारे पर ।
करण शब्द आसुरी जाल,महाकालिका बनाये ढाल।
ब्रान शब्द गुरु बहुरे जान , शब्द शील लाखे लान।
चंग शब्द गुरु आत्मा शक्ति, विवेक गणेश करो भक्ति।
फूं शब्द महा उच्चारे, तेजश ज्ञान सूर्य प्रखारे।
श्री शब्द लक्ष्मी वासनी, श्रीमत प्रभु दया विलाक्ष्नी ।
चंकेश्वरी गुरु नाम अधारा,महाकाल का पञ्च तत्व प्रचारा
नमः शब्द रूद्र बिज है, मृतु नाशक मंत्र मुग्ध है ।
महाकाली सुमरण कर डालो, क्रान शब्द गुरु मुख संभालो ।
शब्द्शील से नाम आधारा, ब्रान शब्द शक्ति भंडारा ।
बुद्धि विवेक दोनों कर जोरी, आत्म शक्ति सभी की होरी ।
तेजश ज्ञान सूर्य प्रधाना, फूं शब्द महा अभिमाना ।
श्रीमत का जो पाठ पढाया , लक्ष्मी -नारायण रूप धराया
महा काल शब्द की जाली, पञ्च तत्वा बिन रहे खाली।
मृतु नाशक रूद्र बिज संभाले , नमः इति शब्द ज्ञान संभाले।
(सतरूप ज्ञान योग के पाया द्वारा महाशक्ति मंत्र :- क्रान ब्रान चंग फूं श्री चंकेश्वरी नमः )-
चंकेश्वरी
देवी चंकेश्वरी जो शब्द शक्ति की देवी है माध्यम चाहे जो भी हो इस संसार में शब्द ही एक ऐसा माध्यम है जो इस प्रकृति को एक दुसरे से जोड़े हुए है ये संसार नाशवान है पर शब्दों का ब्रम्हांडीय रहस्य आज भी इस चाराचार जगत को संचालित किये हुए है इस शुन्य ब्रम्हांड का हम निरक्षण करे तो सब वस्तुए अपने आप में गुंजायमान है सूर्य भी दहाड़ मार रहा है पर प्रकृति ने उसे शून्य तरंग में बांध रखा है उसका कार्य केवल जल कर रौशनी देना है प्रकाश देना है पर उसे अपनी पीड़ा कहने का अधिकार नहीं वास्तव में इश्वरी सत्ता का प्रमाण होते हुए भी हम उसे खोजते है अन्दर बाहार सब जगह उसे तलासते है जो प्रकृति में है वाही तो मुझमे भी है आप सब में है श्वश -प्रश्वाश के माध्यम से हम प्राकृत से जुड़े है और किसी ने सच कहा है प्रहृति से हम नहीं हमसे प्रकृति बनी हुई है इस संसार में दिव्या शक्तिया ही माध्यम है जो दिव्या सत्ताओ की जानकारी रखती है और शब्द के माध्यम से प्रकृति को एक दुसरे से जोड़े रखती है
देवी चंकेश्वरी ही शब्दों की महाशक्ति है चंकेश्वरी में पांच अक्षर है अक्षरों के बारे में कहा गया है की जिसका क्षर नहीं वाही अक्षर है इसलिए अक्षरों के समूह को को ही "शब्द "कहा गया है यही पंचमहाभूतो का प्रतीक भी है जिसमे पृथ्वी ,जल आकाश ,वायु ,अग्नि है जिसकी देवी चंकेश्वरी है इसी से ब्रम्हांड और मनुष्य का जन्म हुआ है ,क्योकि यही ब्रम्हांड की प्रत्येक वस्तु मनुष्य के भीतर भी व्याप्त है
आज यदि हम गौर करे तो मानवीय जीवन शब्द से ही बना है और शब्द से बिगड़ भी गया है आपसी सौहार्द ,प्रेम ,भाईचारा यदि लोगो को लोगो से जोड़ता है तो अपशब्द युद्ध की पृष्ठ भूमि तैयार कर देता है बात एक दुसरे को समझ कर चलने की है पर ईष्या,द्वेष ,अहंकार,भेद भाव इन्शानो को एक दुसरे से कोसो दूर ले जा रहा है इंसान अपने मूल को खोते जा रहे है उद्देश्यों से कोसो दूर खड़े है
देवी चंकेश्वरी ही वो माध्यम है जो मंत्र शक्ति के माध्यम से जीवित जागृत है जो "सतरूप "ज्ञानयोग की महाशक्ति है जिसमे सात शब्दों का समूह है ,९६ अक्षरों का मायाजाल है जो मानव शरीर में स्थित ज्ञानदल ,सप्तद्वार ,सात शारीर को एक में समाहित कर पूर्णता प्रदान करती है
इसी लिए तो कहा गया है _शब्द शब्द सुमिरन मै करू ,शब्दावली बन जाऊ ,हर शब्द में ज्ञान छिपा है ,मौन रह कर सब कह जाऊ "
आज पुनः उस ज्ञान रूपी शब्दों को जगाने की आवश्यकता है ,देवी चंकेश्वरी को पुनः प्राण में स्थापित करने की आवश्यकता है जो शक्ति पीठ बन कर हमारे भीतर की विलक्षणता को बहार ला सके उस दिव्या सत्ता से हमें मिला सके जिसे "शांतिधाम "कहते है
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