साधना




साधना का अर्थ प्रयत्न करना है, सतत चेष्ठ रत रहना, अपने उद्देश्य की और बढ़ते रहना, और लक्ष्य या सफलता को प्राप्त कर लेना ही सिद्धि है। साधना प्रारम्भ करने के पहले अपना उद्देश्य स्थिर कर लेना चाहिए अतः: उत्तम अधिष्ठान निश्चित करना चाहिए, सावधानी रखनी चाहिए , उपयुक्त उपकरण होने चाहिए , मुख्या बात ये है की उत्तम पथ प्रदर्शक हो। क्योकि साधना मार्ग तलवार की धार की तरह तेज 
होता है।उस पर प्रत्येक पग सावधानी से रखना चाहिए
साधक को चाहिए की वह सर्वप्रथम अपने स्वरुप, आपने आत्मा और अपनी देह को पहचाने। मानव को जो बाह्य रूप दिखाई देता है, वह तो मात्र अन्नमय कोष है, स्थूल है, विकारो से युक्त है,इनको पार कर जब अन्दर प्रवेश करते है, वही से साधना के केंद्र दिखाई देता है-अन्नमय कोष के निचे सनाऊ जल है,या दुसरे शब्दों में मानव कोष है, जिससे यह स्थूल शारीर संचालित होता है। एस स्नायु जल  से जीवन की धराये प्रवाहित होती है , इससे परे प्राणमय कोष होता है, जिसे आनंदमय कोष भी कहा जाता है, एस कोष से संपर्क  होने
पर ही मन आनंद सागर में डूबने- उतरने लगता है,अतः सच्ची साधना के लिए मन, बुद्धि और ह्रदय को स्पर्शित करना जरुरी है, इसके लिए उर्ध्वा गति से अर्थात निचे से ऊपर की बढ़ना चाहिए।
साधना के पञ्च प्रधान अंग है-अधिकार, विश्वास, गुरु दीक्षा, सप्रदाय, मंत्र देवता। प्रत्येक कार्य के कुछ नियम होते है, जिस पर चलकर ही व्यक्ति सफलता प्राप्त कर सकता है,सर्वप्रथम साधक को अश्त्पस से मुक्त होना चाहिए। कुलार्णव तंत्र के अनुसार अस्थापस निम्न प्रकार से है-घृणा, लज्जा, भय, शंका, जुगुप्सा, कुलशील और जाती के बंधन , इनसे मुक्त होने पर ही साधक साधना के योग्य बनता है।
प्रत्येक साधक के लिए प्रथम और अनिवार्य कर्त्तव्य है की वह ब्रम्ह मुहूर्त में जग जय, रात्रि का चतुर्थ भाग अमृतमय होता है, यही वह समय होता है , जब साधक आपने बहिर्मन को अंतर्मन में प्रवेश दे सकता है,एस प्रकार के कार्य के लिए यह सर्वथा उपयुक्त समय कहलाता है।
शुद्ध जल से अधोवस्त्र  पहन कर स्नान करे साधनाकाल में यथा संभव तेल, साबुन आदि का प्रयोग न करे,तथा नदी , तलाब  आदि के किनारे स्नान करे। यदि यह संभव न हो तो पत्र मांजकर घर पर ही स्नान करे। स्नान ब्रम्ह मुहूर्त में ही करने का विधान है,विष्णु पूरण में ब्रम्ह मुहुत्र के बारे में कहा है- सूर्योदय से ५८ घटी पूर्वा उषाकाल, ५६ घटी पहले अरुणोदय, ५५ घटी पहले प्रातः:कल और फिर सूर्योदय होता है। रात के पिछले प्रहार अर्थात सूर्योदय से ५६ से ५८ घडी पूर्वा का काल ब्रम्ह मुहूर्त कहा जाता है। तंत्र ग्रंथो में तो एस काल को सर्वाधिक महत्वा दिया गया है। एस कल में उठकर स्नान करने से स्वस्थ्य, आयु,बुद्धि,लक्ष्मी और सौंदर्य कीह वृद्धि  होती है।
स्नानादि से निवृत होकर साधक को पूर्वाभिमुख होकर आसन पर बैठना चाहिए । मंत्र सिद्धि और साधना में आसन का विशेष महत्वा है। आसन सैकड़ो प्रकार के होते है , जिसमे कुशसन, वाश्त्रासन आदि प्रमुख है। उन , कम्बल और मृगछाला सभी प्रकार के साधनाओ में शुभ है-कामना सिद्धि के लिए कम्बल का और विशेष कर लाल कम्बल का आसन शुभ मन गया है। मंत्र सिद्धि के लिए कुशसन श्रेष्ठ है। बिना आसन के किसी भी प्रकार की की गयी साधना निष्फल जाती है। पंचरात्र सहित में बताया गया है की बस की आसन पर दरिद्रता, पत्थर के आसन पर बीमारी, भूमि पर दुःख , छिद्र वाले लकड़ी के तख्ते पर दुर्भाग्य , घास के आसन पर लक्ष्मी नस , तथा पत्तो के आसन पर चित्त भ्रम रहता है।
पूजन कर्म में सिद्धजन और कमलासन प्रसंशनीय है,व्याघ्रचर्म के आसन पर जप करने से ऐ अत्यधिकं लाभ मिलता 

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