कार्यक्रम


स्वामी अनुराज जयंती (२००९)



मानव जीवन अपने आप में ही अमूल्य है और सभी पुरुषार्थ जैसे धर्म ,अर्थ ,काम ,मोक्ष की प्राप्ति आवश्यक है भारतीय ऋचाओ को समझने के लिए चतुर्मुख ब्रम्हा ने चार वेदों की तथा १०८ उपनिषदों की रचना की जो सदगुरु होते है उनमे यह ज्ञान सर्वदा निहित होता है जिसे समझने के लिए ४ गुरु मंडल को समझना होगा जो गुं, गुरुभ्यो नमः ,पं परम गुरुभ्यो नमः ,पं परात्पर गुरुभ्यो नमः ,शं सिद्धश्रमय नमः के रूप में गुंजायमान है परन्तु गुरु को आबद्ध करने के लिए कोई साधना नहीं है गुरु तो स्वयं में शिव है गुरु और शिव में कोई अंतर नहीं होता है इसलिए भी जीवन में ४ शिव परम आवश्यक है जो महाकालेश्वर ,महामृतुन्जय,वैद्यनाथ ,ओंकारेश्वर के रूप में केंद्र बिंदु है

विक्रमादित्य ने इन्हें आधार माना और काल गणनकिया जिसके आधार पर विक्रमसंवत बना महाकालेश्वर की साधना से काल विजय (काल गणना )कीप्राप्ति होती है जिससे संभावित घटना को टला जा सकता है क्योकि किसी भी घटना को घटने के लिए समय और स्थान आवश्यक होप्ता है जिसे "मृत्युर्मे अमृत गमय "कहा गया हैऔर यह तब संभव होगा जब वैद्यनाथ की कृपा प्राप्त होगी जिससे आरोग्य की प्राप्ति और कायाकल्प होता है इसके बाद आवश्यक हो जाता है ध्यान, धारणा ,और समाधी यह तभी संभव हो सकता है जब ओंकारेश्वर की कृपा प्राप्त होगी यही गुरु मंडल का रहस्य है

शास्त्र विदित बात है की भगवान् शिव भी इकार रूपी शक्ति के बिना शव के सामान है ये शक्तिया महाकाली ,महालक्ष्मी ,महासरस्वती है जहाँ महाकाली से शत्रुशमन ,लक्ष्मी से अटूट धन की प्राप्ति होती है और यह तभी संभव है जब हमें महासरस्वती की कृपा प्राप्त हो तब सम्पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है

मानव का सम्बन्ध "प्राणवायु "से प्रकृति के पूर्व से ही सम्बन्ध है जो एक दुसरे के पूरक है श्वास के आवास -प्रवास से प्रकृति में शक्ति का संचरण होता है जो चन्द्र और सूर्य स्वर के माध्यम से होता है परन्तु "ई "रूपी शक्ति अचेत अवस्था में मूलाधार में सोया रहता है इसलिए बिना गुरु के स्पर्श या दीक्षा से इस ज्ञान का जागरण अशंभव है गुरु जब दीक्षा देते है तो ज्ञान का बीजा रोपण होता है बीज धरातल के बिच बोया जाता है बीज बीना प्रकृति में विसर्जित हुए पौध नहीं बनता ठीक उसी तरह शिव अर्थात गुरु दीक्षा देते है तब वो शिवत्व को प्राप्त हो जाता है और उसके पहले स्व कोअर्थात "मै "को विसर्जित करना आवश्यक है मणिपुर में बीजारोपण होता है तब पहले मानव अधोगति में जाता है जहाँ कोई खाश उपलब्द्धि नहीं होती क्योकि मूलाधार पृथ्वी तत्व होने के कारन अपने गुरुत्व में खिचता है उससे ऊपर उठाना होगा स्वाधिष्ठान में फस जाने से भी कोई भला नहीं होने वाला क्योकि इसमें प्रेम स्नेह ,संतान उत्पन्न तक ही सिमित है जिसे पशु भी करते है

जीवन का शुख मणिपुर चक्र के ऊपर है इसलिए "ई"रूपी सुषुम्ना शक्ति जो अचेत रूप में मूलाधार में पड़ा है उसे जगाना पड़ेगा और गुरु यही करता है "दीक्षा "के माध्यम से ,स्पर्श के माध्यम से और जब यह आगे बढ़ता है तब सम्पूर्ण आकाश (शब्द)का ज्ञान और प्रकृति के हर रहस्य अनाहत में खुलने लगते है इसके ऊपर विशुद्ध में मूर्त रूप लेकर साक्षात् वागेश्वरी कृपा प्राप्त हो जाता है और कंठ से मंत्र स्फुटित होने लगता है विशुद्ध ध्वनी निकलने लगती है इसके ऊपर ह्रदय मे शिव और शक्ति का हं और क्षम रूप में आज्ञा चक्र में भान होने लगता है तब ईकार शक्ति के जागरण से शव सामान यह जीवन शिवमय हो जाता है और यही शिवत्व गुरु प्रदान करते है ईष्ट का साक्षात्कार होने लगता है अपना जीवन सार्थक होने लगता है जिसे केवल नेति -नेति कहते है यही परमानन्द की प्राप्ति है

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