शांतिधाम साधक कल्याण समिति
गुरु सत्ता आध्यात्मिक केंद्र तरीघाट (राजिम )छत्तीसगढ़ का गठन चैत्र नवरात्रि एकम को सन १९८९ को किया गया ।जिसका मूल उद्देश्य मानव के आत्मीय शक्तिं को जागृत कर शक्ति संपन्न बनाना
है इसके लिए शब्द शक्ति की देवी चंकेश्वरी को माध्यम बना कर ६४ दिव्या शक्ति का अनुसरण किया गया ।इस केंद्र के संरक्षक एवं संचालक डॉ आनंद राम मतवाले जी है ।जो विगत कई वर्षो से इस संस्थान को पूर्ण निष्ठां पूर्वक चला रहे है ।
डॉ आनंद राम मतवाले जी का जन्म २० जुलाई सन १९६८ को राजिम के पवन क्षेत्र तरीघाट में हुआ ।इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान आनंद जी को दिव्या ज्ञान की अनुभूति हुई ।और उन्होंने पढ़ाई को अधूरा छोड़ कर स्वयं के आत्म साक्षात्कार के लिए दिव्या गुरुओ की तलाश में विशाखापटनम ,चित्तौड़गढ़।,कामाख्या आदि क्षेत्रो में साधना संपन्न करते हुए बस्तर क्षेत्र के दिव्या स्थानो में अनेक ज्ञान और उपलब्धिया हांसिल की ।ओर पुनः वापस लौट कर अपने दिव्या ज्ञान से जनमानस की समस्याओ का समाधान करते आ रहे है ।भारत की प्रांच्या विधाओ अध्यात्म ,ज्योतिष ,आयुर्वेद जैसे विषयो का ज्ञान जानने वाले डॉ आनंद जी प्रत्येक बुधवार को अपने गृह ग्राम तरीघाट में सेवाएं प्रदान कर रहे है
संक्षिप्त विवरण :-
छत्तीसगढ़ राज्य के प्रयाग राज कमल क्षेत्र पद्मापुरी नगरी राजिम से पूर्व दिशा में १६ किलो मी दुरी पर गुरुसत्ता अध्यात्मिक केंद्र तरिघाट(राजिम )स्थित हैजहाँ चंकेश्वरी शक्तिपीठ की स्थापना की गई है भौगौलिक दृष्टीकोण से पूर्व में सरगी नदी (सरयू नदी)एवं आमराई से आन्छदित है पश्चिम में बहरा नार दक्षिण में उपजाऊ धरती तो वही उत्तर में महुआ वृक्षों का सघन प्राकृतिक सौंदर्य आन्छदित है
केंद्र की स्थापना १९८९-१९९० में संस्था के संचालक डाआनंद राम मतावले (गुरूजी )ने किया ग्राम तरिघाट सरयू नदी के घात के ऊपर बसा है वर्तमान में १६०० की जनसँख्या जिसमे सभी समाज के लोग निवासरत है
डा आनंद मतावले गुरूजी (संक्षिप्त परिचय ):-डा मतआवले जी का जन्म २० जुलाई १९६८ में एक संपन्न कृषक परिवार में हुआ पिता श्री घासीदास एवं माता श्रीमती सोनबती मतावले के तृतीय पुत्र परिवार के अन्य सदस्यों में सबसे विरले रहे है जन्म से ही उनमे विलक्षणता विद्यमान रही थी
शिक्षा -दीक्षा :-माध्यमिक शिक्षा स्थानीय स्तर पर एवं स्नातक ,बी .ई श्री गोविंद राम सक्सेरिया इंस्टिट्यूट टेक्नोलोजी इंदौर (मध्यप्रदेश )में हुआ बी .ई के तृतीय वर्ष में ही अचानक से आये घटनाक्रमों ने आध्यात्मिक क्षेत्र की ओर रुख मोड़ दिया
शिक्षा के उपरान्त ग्राम मारकाटोला कंकालिन में समाधिस्थ राजाराव के सूक्ष्म संम्प्रेशन से तंत्र ज्ञान लिया १९९४ में डा श्री नारायणदत्त माली (स्वामी निखिलेश्वर नन्द जी )से दीक्षा प्राप्त कर समाज सेवा एवं अध्यात्म में प्रवेश किया
साधना -सिद्धि :-६४ पूर्व शक्ति साधना के साथ विभिन्न कर्मकांडो के साथ षट्कर्म ,कुण्डलनी योग ,क्रिया योग जीवां मार्ग दर्शन ,महाविद्या आदि
संसथान की स्थापना १९८९ में किया गया जहाँ आज भारतीय प्रंच्या गूढ़ विद्या एवं साबर तंत्र पर निरंतर शोध प्रक्रिया जारी है विभिन्न स्थानों पर छत्तीसगढ़ के अलावा ,उडीसा ,महाराष्ट्र ,हिमांचल आदि राज्यों में विशिष्ट शिविर के माध्यम से समाज सेवा में अग्रणी कार्य करते हुए आ रहे है
होली ,नवरात्रि ,दीपावली ,शिवरात्री एवं विशेष रूप से १८,१९जन्वरि को अन्नुराज जयंती जैसे कार्यक्रम आयोजित कर साधक ,शिष्यों को मार्गदर्शन करते है एवं केंद्र तरिघाट राजिम में प्रति बुधवार को प्रातः ७ बजे से दोपहर २बजे तक जन समस्याओ जैसे जीवन के विभिन्न जटिल समस्यों का निराकरण करते आ रहे है
कर्मकांड :-विशिष्ट गुरुपूजन ,तंत्र बाधा ,राजबाधा ,शत्रुबाधा निवारण एवं अनुष्ठान ,शांति कर्म ,गृहशांति ,कालसर्प व् अन्य अमंगल गतिविधिओ का अनुष्ठान के माध्यम से हल किया जाता है
अनुराज 

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